Wednesday, February 7, 2018

मुंबई दूरदर्शन



                                                      एक सरकारी फैसला


उनका तबादला अप्रत्याशित था क्योंकि ज्यादा समय नहीं हुआ था उन्हें यहां कार्यभार संभालते हुए।

सर, शादी की बात चल रही है समझ नहीं आ रहा क्या करूं!
जाओ जाकर शादी कर लो...
लेकिन लॉ आधे पर है, शादी के बाद कहीं पढ़ने का माहौल न मिला तो सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा!
कोई फर्क नहीं पड़ेगा, समय पर सबकुछ हो जाये तो अच्छा रहता है...

एलफिन्स्ट्न रोड की ट्रैफिक में शुरू हुई बात अंटॉप हिल सेक्टर पांच तक चलती रही।

वह आदमी तजुर्बे से ठस्स है, यही एक स्थिर राय समय के साथ उनके लिए बन गई थी। हालांकि उनके बारे में कई राय बनी लेकिन वह बदलती रही, जो राय हमेशा के लिए बनी रही वह सिर्फ थी कि आदमी के पास जानकारियों का खजाना है और सिविल सेवा में चयन होने तक उसने तीसरा पहर को बिताया है।

उनकी सबसे अच्छी बात यह होती थी कि वह पर्याप्त रूप से सकारात्मक रहते थे और चिड़चिड़ापन उनमें जरा भी नहीं था। कई बार ऐसा लगता था कि इस बात से वह चिड़चिड़ा होंगे लेकिन वैसा होता नहीं था।

एक बार भाईंदर में होली मिलन समारोह में राज्यवर्धन सिंह राठौर आए हुए थे। उन्होंने लंबाचौड़ा भाषण दिया और खूब तालियां बटोरी। राठौर को भी शायद भीड़ के इतने जोशिले होने का अंदाज नहीं था और उन्होंने कार्यक्रम खत्म होते ही अपने निजी सचिव से मुझे फोन करवा कर अगले दिन सवेरे मुंबई एयरपोर्ट पर पूरे कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग देने के लिए कहा। यह एक सरदर्द ही था क्योंकि उस वक्त अंधेरी की भयानक जाम में मैं फंसा था और रॉ फीड को लेकर ऑफिस जाकर उसे सीडी में कन्वर्ट करके और फिर उसे देने लायक बनाने का मतलब कि ड्यूटी से ऑफ हो चुके अलग-अलग विभाग के कर्मचारियों के आगे सर पटकना सहित कई चरणों की जद्दोजहद होने वाली थी।

दरअसल वह होली शादी के बाद मेरी पहली होली थी और मैं और भाग्य ने तय किया था कि साथ में पुआ और पनीर बनाया जाएगा। स्थिति कुछ ऐसी बनी कि रविवार होने के बावजूद उस इवेंट के लिए उन्होंने मेरा नाम दे दिया और ऑफिस ऑर्डर के कारण मेरा और भाग्य की होली की सारी तैयारियां धरी रह गई। तय किया कि भाग्य को भी उस इवेंट में साथ लेकर जाऊंगा और फिर हमदोनों उस सांस्कृतिक कार्यक्रम में साथ ही शिरकत किये। भाग्य पत्रकार दीर्घा में बैठी रही और मैं रिपोर्टिंग करता रहा।

मंत्री के सचिव का फोन आन तनाव के आग में घी तरह था। थोड़ी देर मैंने फोन बगल में रख दिया और फिर दिमाग में कुराफात आई और मैंने सचिव को कॉलबैक करके उनका नंबर दे दिया। अपना रविवार और भाग्य के साथ उस दिन के लिए की गई तैयारी खराब होने के बदले क्यूं न उनका भी रविवार खराब कर दिया जाये!

थोड़ी देर बाद सचिव का कॉल आया तो मैंने कॉल ली ही नहीं। फिर उनका फोन आया,

अरे क्या हो गया...
पता नहीं सर, मुझे फोन पर उन्होंने सीडी देने कहा..
लाईब्रेरी को फोन करके कह दो..
ठीक है सर..

बात हुई। काम हो गया। शिकन तो थी लेकिन चिड़चिड़ापन तब भी नहीं दिखा।

खैर, अगर ऑफिस में थोड़ा बहुत अनुशासन कायम हो पाया है और दिल्ली- मुंबई समन्वय ज्यादा सुलभ हुआ है तो इसका श्रेय भी उनको ही जाता है।

महीनों तक ऑफिस से अंटॉप हिल तक लिफ्ट देने और नेगेटिविटी का सामना करने में उन्होंने जो भावनात्मक मदद दी उसके लिए एक अफसर से अलग उनके व्यक्तित्व को भुलाना शायद कभी मुमकिन नहीं हो पाएगा।

चूंकि वह खुद काफी संघर्ष करके आगे आये थे और आईआईएस बनने के बावजूद उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा आईएएस बनने के लिए दी थी, उन्होंने मेरे लॉ में जहां तक हो पाया, मदद किया। उनको भी पता था कि अगर मैं अभी ठहर गया तो दूरदर्शन के अनिश्चित भविष्य का सामना करने में मेरे द्वारा बरती गई लापरवाही को समय कभी माफ नहीं करेगा।

कई बार ऑफिस पॉलिटिक्स का वह भी हिस्सा बने। छोटी-मोटी वाट्सएप पॉलिटिक्स में उनकी संलिप्तता रही। ज्यादा तेज दौड़ने के कारण उन्होंने कई बार ऑफिस के सामने कुछ चुनौतियां भी खड़ी करवा दीं। बहरहाल, एक अफसर के लिए अपने कार्यकाल में ये सब अपेक्षित ही होता है।

देर से आने के लिए जितनी फटकार उनकी लगी उतनी दिल्ली के डीएलए में भी नहीं थी। एक समय तो ऐसा हो गया कि उन्होंने करीब पांच दिनों के लिए मीटिंग में मेरी "नो एंट्री" कर दी। वो एंट्री तब खत्म हुई थी जब मैं रेनकोन में पूरी तरह भींगा हुआ उस दिन उनके केबिन के बाहर दरवाजे को थोड़ा खोलकर "मे आई कम-इन सर" कहा था। उन्होंने चेहरे के भाव से जो अंदर आने के लिए कहा, उनके चेहरे का वह भाव हमेशा के लिए दिमाग में प्रिंट हो गया।

कभी वह हार्डकोर ब्यूरोक्रेट और कभी क्लोज फ्रेंड की तरह रहे। खुद को क्रेडिट देने का वह कोई मौका नहीं छोड़ते तो दूसरों को भी ईमानदारी से क्रेडिट देते थे।

मुंबई दूरदर्शन के वह पहले और आखिरी अफसर होंगे, जो इतना तेजतर्रार रहा कि उसे जज कर पाना मुश्किल रहा कि मेरी उनके बारे में कोई आखिरी राय तीन साल में भी स्थापित नहीं हो पाई।



और अंत में...


दफ्तर-ए-मुंबई दूरदर्शन

































Monday, January 29, 2018

संक्रमण काल


                                    गूगल मेप, ईयरफोन और कैलकुलेटर के आईने में                                                 

मुंबई के एक निजी एफएम चैनल का एक विज्ञापन हाल में जारी हुआ है जिसमें एक बुजुर्ग टैक्सी चालक एक प्रेमी जोड़े को टैक्सी में मुंबई में कहीं ले जा रहा है।

जैसा कि अमूमन होता है, जोड़ा पिछली सीट पर बैठा है। एक मोड़ के पास से गुजरते हुए लड़का टैक्सी को आगे से दाएं लेने के लिए कहता है तो बुजुर्ग अपने तजुर्बे का हवाला देकर कहता है कि वह उस रास्ते से भी छोटे रास्ते से उसे वहां तक पहुंचा देगा जहां उसे जाना है। बात बढ़ती है तो बुजुर्ग टैक्सी चालक अपने उम्र का हवाला देते हुए कहता है कि वह मुंबई के हर रास्तों से वाकिफ है और जब गूगल मेप आया भी नहीं था तब से वह टैक्सी पर उन जैसे कई जोड़ों को मुंबई घुमा चुका है।

अभी हाल में बिहार जाना हुआ। पत्नी के लिए होम्योपैथ को कोई दवा लेनी थी और इस बारे में जानकारी नहीं थी कि वहां होम्योपैथ की दवा कहां मिलेगी। मेरी और पत्नी की बात पास बैठी कक्षा सात में पढ़ने वाली साली सुन रही थी। उसने बीच में ही कहा कि जायसवाल के यहां होम्योपैथ की दवा मिलेगी।

मुझे लगा कि शायद जायसवाल का कोई दवाखाना होगा जो उसके स्कूल के रास्ते में पड़ता होगा लेकिन वैसा नहीं था। वह कभी किसी के साथ कहीं गई थी तब उसने जायसवाल की क्लीनिक के बोर्ड पे पढ़ा था कि वहां होम्योपैथ की दवा मिलती है।


करीब सात साल पहले जब मैं दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर बनारस के एक साथी को लेने गया था तो उन्होंने एक मजेदार बात बताई थी।

वह अमेरिका से आए थे और उस वक्त रात के बारह बजने में कुछ ही मिनट बाकी रह गये थे। हमलोग एयरपोर्ट में ही बने एक रेस्टोरेंट में बैठकर उनकी दिल्ली से बनारस की कनेक्टिंग फ्लाईट का इंतजार करने लगे।

मैंने उनसे यूं ही पूछ लिया कि अमेरिका और भारत में सबसे बड़ा अंतर आपको क्या लगता है। मुझे उम्मीद थी कि वह कुछ ऐसा बताएंगे जो भारत को अमेरिका की तुलना में पिछड़ा दिखाएगा लेकिन उन्होंने यह कहकर चौंका दिया कि भारत के लोग अमेरिका के लोगों से ज्यादा स्मार्ट होते हैं।

उन्होंने चौंकाने का सिलसिला जारी रखते हुए तुरंत उसका उदाहरण भी पेश कर दिया। पास ही एक स्नैक्स की दुकान पर जाकर उन्होंने दुकानदार से पूछा कि जो फ्लाईट अभी आई है वह कहां से आई है। उन्होंने चेहरे का भाव ऐसा किया कि वह किसी का इंतजार कर रहे हों।

दुकानवाले ने चौंकाते हुए न केवल अमेरिका से आई उस फ्लाईट का पूरा विवरण दे दिया बल्कि बात बात में हवाई अड्डे के अंदर से बाहर की सारी प्रक्रिया बता डाली।

ऐसा ही कुछ पिछले दिन भी हुआ जब ईजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू मुंबई के होटल ताज में आये। होटल के बाहर ओबी वैन की पार्किंग और पूरी व्यवस्था करने के चक्कर में मोबाइल की बैट्री तीन फीसदी पर आकर टिक गई। फोन आना तो बंद होने से रहा!

पास के ही पान दुकान को मानमनोव्व्ल करके अपना मोबाइल चार्ज करने के लिए दे दिया। पानवाला निकला बिहारी तो कुछ बात भी निकलने लगी। बात बात में उसने ताज के रसोईए के नाम पते के अलावा, पिछले दिनों होटल में घटी हर छोटी बड़ी जानकारी दे दी। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह थी उसे इंटर्न के तौर पर वहां आए युवकों की भी पूरी कुंडली मालूम थी।



ये सब बातें इसलिए प्रासंगिक होने लगी हैं कि मुंबई लोकल से लेकर दिल्ली मेट्रो तक के पिछले करीब पांच साल के अनुभव से यही जान पड़ता है कि लोग अपनी आंख और मोबाईल स्क्रीन के बीच तीसरा कोई चीज देखना नहीं चाहते।

कान में अब बातों के बजाए ईयरफोन से निकले गाने भर रहे हैं।

आलम यहां तक पहुंच गया है कि दूध, अंडा और बेसन अगर एकसाथ खरीद लिया जाये तो कुछ दुकानदार रुपये जोड़ने के लिए कैलकुलेटर निकाल लेते हैं।

वहीं एक वह दौर भी था जब छह-पांच करते हुए पांच-छह सौ रुपये का जोड़ तो परचून की दुकान पर ऐसे ही हो जाया करता था।

मुंबई का वह वृद्ध टैक्सीवाला शायद उस अंतिम पीढी का कोई नुमाइंदा है जिसके बारे में वह एनआरआई मेहमान फख्र के भाव से उस दिन हवाईअड्डे पर बता रहे थे। आगे की पीढी कैलकुलेटर, ईयरफोन और गूगल मैप वाली हो चली है। हम अपनी खूबी बड़ी तेजी से खो रहे हैं।




Sunday, January 14, 2018

कतरनों का


                                                             रोग             

कितने ही ब्लॉग को ड्राफ्ट में डालने के बाद फिर से हिम्मत जुटा कर कुछ रखने यहां आ जाता हूं।

जो यहां रखता हूं वह अपने लिए ही रखता हूं। शब्द न तो रखे-रखे रिश्तों की तरह कमजोर होते हैं और न ही पड़े पड़े आदमी की तरह बेजान। जैसे छोड़िये वैसे ही आपको मिलेंगे।

कभी कभी अपने पुराने पोस्ट को पढ़ता हूं तो गहरे में चला जाता हूं, फिर धीरे-धीरे करके बाहर आता हूं। अपने अंदर बहुत से योगेश से मिलकर कई बार पिछले पोस्ट को पढ़ते हुए ऐसा लगा है कि जो हो रहा है वह इतना अनिश्चित है कि उसके बारे में सोचना बेकार है।

दूरदर्शन डारमेट्री, घाटकोपर, अंटॉप हिल सेक्टर छह फिर अंटॉप हिल सेक्टर पांच और अब मानसरोबर!

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"पिछले गुरुवार को मैंने अपनी जान लेने की कोशिश की। कोई खास वजह नहीं है। कोई तनाव भी नहीं है। मन ऊब गया है। वही शोर, वही आवाजें...शिकायतें नहीं है। अजीब सा एहसास है मन में, अजीब। जिस रोज नया दिन निकलता है, मैं वही पुराना हूं। दुनिया वही पुरानी है। वैसे ही चली जा रही है। मुझे लगा भाई जो ये जिंदगी की गाड़ी चल रही है, इसकी चेन मैं खींचता हूं और मैं उतर जाता हूं..."

फिल्मकारों को पता है कि इरफान खान से क्या कहलवाना दर्शकों को पसंद आएगा। इरफान खान जब इन पंक्तियों को अपनी फिल्म "रोग" में मनोचिकित्सक से बात करते हुए कह रहे होते हैं तो कई स्ट्रगलर इरफान हो रहे होते हैं।

"रोग" फिल्म का एक दृश्य
इन तमाम बातों के बीच जो बात हमेशा सच साबित हुई है वह है हर रात के बाद सुबह होना चाहे रात कैसी भी हो।

रोग एक ऐसी लव स्टोरी है जिसमें थ्रिलर के साथ-साथ गजब का इमोशन भी है। यह इस तरह की शायद पहली फिल्म है। थ्रिलर के लिए हॉलीवुड की कई फिल्में हैं जिन्हें देखा जा सकता है लेकिन उनमें से किसी में इस तरह का इमोशन कहां है!

इंस्पेक्टर राठौड़ की भूमिका में इरफान खान कमोवेश ऐसे हैं जैसे तलाश में आमिर खान थे। दोनों फिल्मों मे एक चीज कॉमन यह है कि रोग और तलाश दोनों ही फिल्में तह तक जाती है। एक आदमी या मर्द के अंदर चल रही उथल पुथल को बहुत करीब से छूते हुए ये दोनों फिल्में निकलती है।

तीसरा पहर काटता हुआ आदमी क्या क्या करता है यह इरफान करते हुए दिखते हैं। मसलन खुद को समाप्त करने की सोच। खुद को समाप्त करने की सोच और आत्महत्या में बहुत फर्क है। आत्महत्या वैसा शब्द है जो डर, तनाव, बेबसी, हार वगैरह से जुड़ता हुआ दिखता है, जबकि खुद को समाप्त करना एक तरह की संतुष्टि को रेखांकित करता है।

संतुष्टि बड़ी चीज है।

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शैलेष पेठे सह्याद्री में एंकर हैं। कुछ दिनों पहले उनके पिताजी की मृत्यु हो गई। दफ्तर में मालूम हुआ कि उनके पिताजी ने शैलेष पेठे के ड्राइवर को कहा कि शैलेष को बोलो कि ज्यादा परेशान अब मत होने, मुझे अब जाना है। वह तसल्ली में थे। फिर उन्होंने स्वेच्छा से ही खानापीना छोड़ दिया।

एक संतोषप्रद जिंदगी।

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क्या सुबह होगी?
अबतक हुई है तो आगे भी होनी चाहिए!

तीसरा पहर जो काट पाया वही सुबह को देखता है और तीसरा पहर काटना ही स्ट्रगल है।

Friday, November 17, 2017





सोचा एक बार कि कोई टका सा जवाब दे दूं लेकिन फिर रुक गया और आखिरकार रुका ही रह गया

Monday, November 13, 2017

दरम्यान


                                                 तुम्हारा नवां महीना और मैं...!

रात तीन बजे टहलते हुए जब बिस्तर के पास आया तो कोई आकर्षण बिस्तर में बाकी नहीं बचा था। एफएम भी शाम से बजते बजते थक गया था और उसके गानों में उमंग जैसा अब कुछ नहीं था।

ड्राॅल से एक मुट्ठी सिक्का निकाला और बिस्तर पर पसारने के बाद फिर से टहलने लगा। लकी अली का कोई गाना एफएम पर आ रहा था। लकी अली "सुर" के दिनों से ही दिल पर छाये हुए हैं।

जाने क्या ढूंढता है ये मेरा दिल तुझको क्या चाहिये जिंदगी...

कमरा छोटा हो तो चीजों पर नजर रखना आसान होता है। बड़ा हो तो मुश्किलें आती है। जिंदगी की तरह ही है कमरा भी। ज्यादा लोगों को शामिल करने पर तनाव बनता है! तुम्हें मालूम है कि लोगों को कैसे और कबतक इंटरटेन करता हूं।

बेकार गृह-प्रबंधन का नजारा 
"हैलो!
जी।
कहां हो!
ट्रेन में हूं।
नंबर भी डिलीट कर दिये!
अरे नहीं जेमिन भाई बताइए।"

आवाज से पहचानने की कला अभी भी जीवित है। उनका कोई काम था, जो सुनने की फुर्सत एक महीने तक नहीं मिल पाई। खैर, नंबर सेव कर लिया उनका। पिछली बार अनुवाद का कोई काम करवाए थे अब फिर उन्होंने किसी काम से ही फोन किया!

झूठ बोलते हैं वे लोग जो कहते हैं रात तीन बजे का वक्त कुंभकर्ण का वक्त होता है जिसमें आदमी कितना भी कोशिश कर ले नींद को टाल नहीं पाता। मुझे तो नींद नहीं आई अबतक!

जो सिक्के बिस्तर पर बिखेरे हैं वह ट्यूब की लाईट में चमक रहे हैं।

ट्यूब से कुछ नोकझोंक याद आई। तुमने तब मुझे नमूना कहा था जब मैंने कहा था कि मेरे मुंह पर अपना लाल वाला दुपट्टा रख दो और स्विच ऐसे ऑन करना कि मुझे मालूम न चले। तुम कुछ बुदबुदाती हुई तीन कदम चलकर लाईट ऑन कर दी। मैंने पूछा लाईट ऑन की हो क्या। तुमने बोला नहीं।

तुम्हारे लाल दुपट्टे से मुझे लाईट की झलकी दिख तो गई थी लेकिन तुम्हारे मुंह से झूठ सुनना प्यारा लग रहा था। कैसा? वैसा जैसे कोई नन्ही-सी लड़की अपने दोनों हाथ से कुछ पकड़कर उसे पीठ के पीछे छिपाकर मासूमियत से बोले कि कुछ नहीं है।

बल्ब या ट्यूब की लाईट में नींद आनी मैट्रिक के दिनों से ही बंद हो गई थी। एक दौर तो वह भी आया था जब बिजली होने के बावजूद ट्यूब बंद करके और लैंप जलाकर रात की पढ़ाई की थी।

ट्यूब जलने पर ऐसा लगता था कि किसी बड़ी दुनिया में बैठा हूं। आसपास बहुत सारी चीजे हैं। बिस्तर है। डायरी है। रेडियो है। खिड़की है। मच्छरदानी है। दीवाल है वगैरह! लैंप की रोशनी में आसपास की चीजें अंधेरे में गुम हो जाती थी और टेबल पर रखी पत्रिकाओं और सीमित किताबों के अलावा कुछ भी नहीं दिखता था।

खुद को सीमित रखने का यह प्रयास बाद में आदत बनी और फिर इस आदत ने खुद को इतना व्यापक किया कि जीवनभर न किसी से दोस्ती हो सकी न दुश्मनी। कुछ संयोग-कुसंयोग जरूर हुए लेकिन निजता हमेशा बरकरार रही।

किसी से बात करने का अर्थ खर्च होना है।

कल किसी ने फेसबुक पर दिल्ली संग्रहालय की एक फोटो डाली थी जिसमें पांच हजार साल पुरानी एक महिला का कंकाल था, जिसके बांये हाथ में चूड़ियों के निशान थे। चूड़ियां सच में कितनी पुरानी परंपरा है न!

चूड़ियां
जिंस की पिछली जेब में जो सिक्के थे उसे भी बिस्तर पर फैलाने के बाद आखिरीबार वाट्सएप खोला तो तुम्हारा मैसेज था "आप हो! 😡" रात साढे दस बजे जो मैंने तुम्हें "कुत्ते का दुम" लिखा उसका रिप्लाई तुमने देर रात दो बजे किया था। कितनी बार कहा था तुम्हे कि चुरा नहीं 'चिउड़ा' होता है! तुम गूगल सर्च से कहीं से "चूरा" लिखा निकालती और मुझे भेज देती। आखिर में मैंने राजपाल प्रकाशन के हिंदी शब्दकोश में तुम्हें "चिउड़ा" लिखा दिखाया लेकिन उस रात शांत रहने के बाद फिर से तुमने "चिउड़ा" को चूरा लिखना शुरू कर दिया।

बिस्तर पर छितरा कर होना और पूरी रात लंबा-चौड़ा होते रहना 2003 के बाद लगी आदत है। 2003 ही वह संक्रमण साल रहा था जबसे कई आदतें छूटी और कई आदतें लगी थी।

रात बीतती रही और सिक्कों की झनझनाहट होती रही। सवेरे "आय ड्राॅप" के लिए बिस्तर पर हाथ फैलाया तो फिर सिक्के एक दूसरे से सटते हुए खनखनाए। यही खनखनाहट इन सिक्कों की सार्थकता थी, जो उन्होंने प्रमाणित कर दी।

यह कृत्रिम झनझनाहट मेरी एक शरारत थी जो मैंने खुद के साथ की थी खुद को यह एहसास भर दिलाने की तुम यहीं हो, यहीं कहीं मेरे साथ हो। हर करवट में तुम्हारी चूड़ियों की खनक जतलाती है कि तुम और हम पास में एक दूसरे को सुला रहे हैं।

वह सिक्कों की खनखनाहट और कुछ नहीं तुम्हारे चूड़ियों की आवाज है। तुम पास हो। चीजों को अनुभव करने की यह पुरानी कला है। दूर की चीजों को करीब से महसूस करना एक कला है और मैं कला का छात्र हूं।