Thursday, November 30, 2017

Friday, November 17, 2017





सोचा एक बार कि कोई टका सा जवाब दे दूं लेकिन फिर रुक गया और आखिरकार रुका ही रह गया

Monday, November 13, 2017

दरम्यान


                                                 तुम्हारा नवां महीना और मैं...!

रात तीन बजे टहलते हुए जब बिस्तर के पास आया तो कोई आकर्षण बिस्तर में बाकी नहीं बचा था। एफएम भी शाम से बजते बजते थक गया था और उसके गानों में उमंग जैसा अब कुछ नहीं था।

ड्राॅल से एक मुट्ठी सिक्का निकाला और बिस्तर पर पसारने के बाद फिर से टहलने लगा। लकी अली का कोई गाना एफएम पर आ रहा था। लकी अली "सुर" के दिनों से ही दिल पर छाये हुए हैं।

जाने क्या ढूंढता है ये मेरा दिल तुझको क्या चाहिये जिंदगी...

कमरा छोटा हो तो चीजों पर नजर रखना आसान होता है। बड़ा हो तो मुश्किलें आती है। जिंदगी की तरह ही है कमरा भी। ज्यादा लोगों को शामिल करने पर तनाव बनता है! तुम्हें मालूम है कि लोगों को कैसे और कबतक इंटरटेन करता हूं।

बेकार गृह-प्रबंधन का नजारा 
"हैलो!
जी।
कहां हो!
ट्रेन में हूं।
नंबर भी डिलीट कर दिये!
अरे नहीं जेमिन भाई बताइए।"

आवाज से पहचानने की कला अभी भी जीवित है। उनका कोई काम था, जो सुनने की फुर्सत एक महीने तक नहीं मिल पाई। खैर, नंबर सेव कर लिया उनका। पिछली बार अनुवाद का कोई काम करवाए थे अब फिर उन्होंने किसी काम से ही फोन किया!

झूठ बोलते हैं वे लोग जो कहते हैं रात तीन बजे का वक्त कुंभकर्ण का वक्त होता है जिसमें आदमी कितना भी कोशिश कर ले नींद को टाल नहीं पाता। मुझे तो नींद नहीं आई अबतक!

जो सिक्के बिस्तर पर बिखेरे हैं वह ट्यूब की लाईट में चमक रहे हैं।

ट्यूब से कुछ नोकझोंक याद आई। तुमने तब मुझे नमूना कहा था जब मैंने कहा था कि मेरे मुंह पर अपना लाल वाला दुपट्टा रख दो और स्विच ऐसे ऑन करना कि मुझे मालूम न चले। तुम कुछ बुदबुदाती हुई तीन कदम चलकर लाईट ऑन कर दी। मैंने पूछा लाईट ऑन की हो क्या। तुमने बोला नहीं।

तुम्हारे लाल दुपट्टे से मुझे लाईट की झलकी दिख तो गई थी लेकिन तुम्हारे मुंह से झूठ सुनना प्यारा लग रहा था। कैसा? वैसा जैसे कोई नन्ही-सी लड़की अपने दोनों हाथ से कुछ पकड़कर उसे पीठ के पीछे छिपाकर मासूमियत से बोले कि कुछ नहीं है।

बल्ब या ट्यूब की लाईट में नींद आनी मैट्रिक के दिनों से ही बंद हो गई थी। एक दौर तो वह भी आया था जब बिजली होने के बावजूद ट्यूब बंद करके और लैंप जलाकर रात की पढ़ाई की थी।

ट्यूब जलने पर ऐसा लगता था कि किसी बड़ी दुनिया में बैठा हूं। आसपास बहुत सारी चीजे हैं। बिस्तर है। डायरी है। रेडियो है। खिड़की है। मच्छरदानी है। दीवाल है वगैरह! लैंप की रोशनी में आसपास की चीजें अंधेरे में गुम हो जाती थी और टेबल पर रखी पत्रिकाओं और सीमित किताबों के अलावा कुछ भी नहीं दिखता था।

खुद को सीमित रखने का यह प्रयास बाद में आदत बनी और फिर इस आदत ने खुद को इतना व्यापक किया कि जीवनभर न किसी से दोस्ती हो सकी न दुश्मनी। कुछ संयोग-कुसंयोग जरूर हुए लेकिन निजता हमेशा बरकरार रही।

किसी से बात करने का अर्थ खर्च होना है।

कल किसी ने फेसबुक पर दिल्ली संग्रहालय की एक फोटो डाली थी जिसमें पांच हजार साल पुरानी एक महिला का कंकाल था, जिसके बांये हाथ में चूड़ियों के निशान थे। चूड़ियां सच में कितनी पुरानी परंपरा है न!

चूड़ियां
जिंस की पिछली जेब में जो सिक्के थे उसे भी बिस्तर पर फैलाने के बाद आखिरीबार वाट्सएप खोला तो तुम्हारा मैसेज था "आप हो! 😡" रात साढे दस बजे जो मैंने तुम्हें "कुत्ते का दुम" लिखा उसका रिप्लाई तुमने देर रात दो बजे किया था। कितनी बार कहा था तुम्हे कि चुरा नहीं 'चिउड़ा' होता है! तुम गूगल सर्च से कहीं से "चूरा" लिखा निकालती और मुझे भेज देती। आखिर में मैंने राजपाल प्रकाशन के हिंदी शब्दकोश में तुम्हें "चिउड़ा" लिखा दिखाया लेकिन उस रात शांत रहने के बाद फिर से तुमने "चिउड़ा" को चूरा लिखना शुरू कर दिया।

बिस्तर पर छितरा कर होना और पूरी रात लंबा-चौड़ा होते रहना 2003 के बाद लगी आदत है। 2003 ही वह संक्रमण साल रहा था जबसे कई आदतें छूटी और कई आदतें लगी थी।

रात बीतती रही और सिक्कों की झनझनाहट होती रही। सवेरे "आय ड्राॅप" के लिए बिस्तर पर हाथ फैलाया तो फिर सिक्के एक दूसरे से सटते हुए खनखनाए। यही खनखनाहट इन सिक्कों की सार्थकता थी, जो उन्होंने प्रमाणित कर दी।

यह कृत्रिम झनझनाहट मेरी एक शरारत थी जो मैंने खुद के साथ की थी खुद को यह एहसास भर दिलाने की तुम यहीं हो, यहीं कहीं मेरे साथ हो। हर करवट में तुम्हारी चूड़ियों की खनक जतलाती है कि तुम और हम पास में एक दूसरे को सुला रहे हैं।

वह सिक्कों की खनखनाहट और कुछ नहीं तुम्हारे चूड़ियों की आवाज है। तुम पास हो। चीजों को अनुभव करने की यह पुरानी कला है। दूर की चीजों को करीब से महसूस करना एक कला है और मैं कला का छात्र हूं।


Sunday, November 12, 2017

बेकाबू प्रतिक्रिया


फेमिनिज्म से भरी दुनिया में आपकी सुरक्षा की गारंटी कौन लेता है - मुंबई ट्रैफिक पुलिस!

ज्यादा दिन नहीं बीते जब एक महिला द्वारा सेना के जवान को बीच सड़क पर थप्पड़ जड़ने का मामला प्रकाश में आया था। उस मामले और मलाड में हुई ताजा घटना में बड़ा अंतर यह है कि मुंबई ट्रैफिक पुलिस का यह जवान सेना के उस जवान जैसा विनम्र नहीं निकला।

मलाड में कार में बैठी महिला शायद इस गफलत में रही होंगी कि उसके महिला होने का फायदा उसे मिलेगा और वह सही थीं क्योंकि फायदा उसे मिला भी और वह कांस्टेबल निलंबित हो गया। लेकिन नया वीडियो सामने आया है जिसमें पुलिस के जवान महिला से यह विनती करते हुए दिख रहे हैं कि वह गाड़ी से उतरे।

गुरगांव में सैनिक पर हाथ उठाती महिला
कुछ अखबारों ने इस खबर को फेमिनिज्म का तड़के लगाते हुए लिखा है "दूध पिलाती महिला सहित गाड़ी को उठा लिया कांस्टेबल ने"। आह! कितना निर्मम! कितना निर्दयी! ओह!

पत्रकारिता में पार्टी हो जाने से बड़ा अपराध लोकतंत्र में और भला क्या हो सकता है।

महिला किस तरह महिला होने का फायदा उठाकर विक्टिम प्ले करती है यह Jyoti Tiwari की किताब अनुराग से गुजरकर देख लीजिये। मैं खुद भी इसका भुक्तभोगी रह चुका हूं। मुंबई पुलिस का वह जवान सस्पेंड होते होते यह संदेश दे गया कि फेमिनिज्म के जमाने में आपकी सुरक्षा की गारंटी कौन लेता है।

ज्यादा समय नहीं बीता जब गाड़ी की पिछली सीट पर नवजात को छोड़कर एक दंपति द्वारा माॅल में शापिंग करने का मामला तब प्रकाश मे आया जब किसी पत्रकार की नजर उस कार पर पड़ी और उसने वीडियो बनाकर चैनल पर ऑन एयर कर दिया था। इस खबर का जिक्र सिर्फ उनके लिए जिनका दिल "दूध पिलाती महिला को गाड़ी सहित उठा लिया गया" जैसी खबर से पसीज गया।

                                                                                                                                                                मुंबई पुलिस के हाथों मेरी गाड़ी भी टो हुई है और मेरा कई बार मुंबई ट्रैफिक पुलिस से सामना हुआ है। मुझे उनके मेहनत को सलाम करने का मन करता है।


अब याद कीजिए जब मेजर गोगोई ने सेना की टुकड़ी और जरूरी संसाधनों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए किस तरह एक पत्थरबाज को जीप के आगे बांध कर अपने काम को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। हालांकि शुरू में काफी हल्ला मचा लेकिन आखिर में सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने खुद मेजर की पीठ थपथपाई।

कई बार ऑन द स्पाट फैसले लेने होते हैं। ये फैसले अपने नहीं व्यापक जनहित को देखते हुए लेने होते हैं। मुंबई ट्रैफिक पुलिस हो या सेना का मेजर, उनके सामने वही विकल्प बचा होता है जो उन्होंने किया। उनके साथ खड़े होइए क्योंकि अगर उनका मनोबल गिरा तो जनहित को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। 


Wednesday, November 8, 2017

सहर


                                          पूर्णियां : फिर वही दिल लाया हूं                     

पटना हवाईअड्डे पर वह पहला आगमन था।
अतीत में हुई दुर्दशा और बेगूसराय से मुंबई तक के सफर का हर पड़ाव दिमाग में बारी बारी से अपनी हाजिरी लगवा रहा था।

पुलिस रेड – यस सर। भैया की धुलाई – प्रजेंट सर। मैट्रिक में बेकार रिजल्ट – यस सर। हॉस्टल एक्सिडेंट – आया हूं सर। बाघी – प्रजेंट सर। आहार उत्सव – यस सर। खगड़िया – प्रजेंट सर। दिल्ली – आया हूं सर। कलकत्ता – प्रजेंट सर। "प्रभात किरण इंग्लिश स्कूल" – यर सर। आईआईएमसी रिजल्ट – यस सर। सिटी न्यूज – यस सर। यूको बैंक - यस सर! कोई पहले। कोई बाद में। इस बीच आईआईएमसी, जर्मन क्लासेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय, इग्नू आदि बीच में खड़े होकर हाजिरी देते जा रहे थे ऐसे ही जैसे कक्षा में कोई अपनी हाजिरी बोलना भूल गया हो और अचानक याद आने पड़ हड़बड़ा कर खड़ा होकर बोले।

हर पड़ाव यह जतलाता जा रहा था कि वह स्मृति से कहीं बाहर नहीं गया है और वहीं किसी कोने में मौजूद है।


कितनी देर लगेगी
मामू बस पहुंच रहे हैं ट्रैफिक बहुत है
आप जहां हो वहीं रूको मैं ओला से वहां तक आ जाता हूं
मामू बस आ गया
ठीक है मैं यहीं हूं पिकअप प्वाइंट में

हवाईअड्डे पर उतरकर जो पहला सरप्राइज मिला वह नई गाड़ी थी। पूर्णियां से लाल स्कॉर्पियो भेजा गया था पटना हवाईअड्डे पर पिक करने के लिए।

करीब आधे घंटे के इंतजार के बाद गाड़ी आई और उसके तुरंत बाद फोन बजा।

"बिहार में स्वागत है लक्की
...
गाड़ी कैसी है
तुम्हारे पास तो बोलेरो था न
हां। ये नई गाड़ी है। तुम्हारे बारात जाने के लिए।
...दीदी..."

कई बार ऐसा लगा कि मेरी शादी की जल्दी दीदी को मुझसे ज्यादा थी। दीदी घर की सबसे बड़ी और मैं घर का सबसे छोटा इसके बावजूद परिवार में आपस में जितने भी रास्ते एक दूसरे तक पहुंचने के थे उन सबमें सबसे छोटा रास्ता मेरे और दीदी के बीच ही था। 

अगले दस मिनट में हवाई अड्डे पर ली गई अपनी फोटो घर के वाट्सएप ग्रुप पर भेजकर एक लंबी सांस ली और फिर गहरे में गोता लगा दिया।

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शाम अपनी गति में ढलती हुई बेहद मादक लग रही थी। मुंबई में सड़क किनारे सालों से इमारतों को देखने के बाद सड़क की दोनों तरफ इस तरह बस्तियां, खेत, पगडंडी, दुकानें वगैरह सुहावने लग रहे थे।

"एसी बंद करके विंडो खोल दो।"

हवा आई तो भूख जगा गई। चंदन ने खगड़िया से थोड़ा आगे बढ़कर गाड़ी रोका।

खाना लगा। एक रोटी खत्म हुई होगी कि बाहर लोगों का जुटान शुरू हो गया। शोर बढ़ता गया। चंदन खाना छोड़कर बाहर गया। लेकिन चंदन के आने से पहले कुछ आवाजें एक साथ अंदर तक पहुंची - पांच सौ और हजार का नोट बंद हो गया है।

खाना खत्म करने के बाद काउंटर पर तमाशा इंतजार करता हुआ मिला। होटल वाले ने पांच सौ का नोट लेने से मना कर दिया। काफी बहसबाजी के बाद वह माना।

गाड़ी में बैठते ही ट्विटर खोला। हर तरफ कोहराम मचा था। रघुनाथ सर के ट्विट पर नजर पड़ी, उन्होंने सीधे नरेन्द्र मोदी को ट्वीट कर अपने बेटे की शादी में नोटबंदी के कारण होने वाली संभावित दिक्कतों के बारे में लिखा था।

ऑफिस में भी हाहाकार की स्थिति थी। सब लाइन-अप में जुटे थे। सोशल मीडिया में वैसी हलचल पहले कभी नहीं दिखी थी उस शाम दिखी।

'सर, क्या हुआ है?
बहुत अच्छा हुआ है, अब से 500 और 1000 रद्दी हो गया।
मतलब जो मेरे पास है वो!
अब वह बैंक में ही जमा करो।'

सिद्धार्थ बोडके भारतीय सूचना सेवा के तेजतर्रार युवा अधिकारी हैं और उनसे बात करके मोटामोटी समझ बनी कि आखिरकार हुआ क्या है!

कब मिजाज अपनी जिंदगी से निकलकर विमुद्रीकरण और सोशल मीडिया की तरफ शिफ्ट हुआ पता भी नहीं चला!

उस शाम लाल स्कॉर्पियो में बैठा पुरानी टी शर्ट पहना वह लड़का दरअसल अपनी सगाई में जाने के लिए नहीं बल्कि एक लड़की से मिलने जा रहा था, जिसे उसे अपनी हाजिरी में दर्ज सभी घटनाओं के बारे में स्पष्ट बताना था।

उसे एकबालिया बयान देना था, जिसके लिए उसने खुद को चार घंटे की फ्लाइट में तैयार किया था।

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