Wednesday, July 19, 2017

वाट्सएप...

                         
                                                       क्लास
                       

दुनियादारी खुद को फैलाते हुए यहां तक ले आई है कि वाट्सएप भी अब दुनियादारी का ही एक हिस्सा सा बन गया है. साल भर पहले एक नजदीकी रिश्तेदार की तरफ से वाट्सअप पर भेजी गई दीपावली की शुभकामना का जवाब नहीं देने के कारण उनकी नाराजगी मोल लेनी पड़ी थी. महीनों बाद तक उन्हें वह बात याद थी और जब मिलने का संयोग हुआ तो तत्काल उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी.

आदमी भागा हुआ सा दिखता है. गौर से देखने पर हर आदमी कहीं न कहीं से छिपता हुआ सा दिखता है. माहौल इस रूप में लोगों को इतना डराएगा इसकी कल्पना शायद किसी ने भी नहीं की होगी और अगर की भी होगी तो शायद इस स्वरूप में नहीं की होगी.

वाट्सएप ने आदमी के व्यक्तित्व को सार्वजनिक करने या यूं कहें उसे एक्सपोज करने में बड़ी भूमिका अदा की है. किसी आदमी का व्यक्तित्व का एक हिस्सा उसके वाट्सअप स्टेटस से जाहिर होता है. कई तह हैं.

स्टेटस बदलने की दर, स्टेटस का कंटेंट वगैरह जैसे कई तह हैं जिससे किसी को भांपा जा सकता है और उसके मानसिक स्थिति के करीब तक पहुंचने का जोखिम उठाया जा सकता है.



वाट्सएप मैसेज में आने वाले चुटकुले, कटाक्ष, व्यंग्य या फिर एक खास तरह की बातों से किसी आदमी के क्लास का भी पता चलता है.

सवेरे एक बड़े केन्द्रीय कर्मचारी का वाट्सएप आया. उन्होंने एक व्यंग्य भेजा जिसमें एक जोड़े का मजाक यह कहकर बनाया गया था कि उस महिला ने शायद सोमवारी के दिन व्रत करने के दौरान गलती से बर्गर खा लिया था!

मन क्षुब्ध सा हो गया.

क्लास एक बड़ी चीज है. वह क्लास ही है कि लोग चार पहिया और एक स्टियरिंग की समानता के बावजूद डीजल गाड़ी, पेट्रोल गाड़ी और सीएनजी में फर्क करते हैं.

एक पुराने पड़ोसी में दिल्ली में किसी तीसरे आदमी का जिक्र करते हुए कहा था कि वह इतना कंजूस है कि सीएनसी की गाड़ी से चलता है. यही क्लास है!

मुंबई में रहते हुए जिसने भी पुलिस इंस्पेक्टर से मिलना हुआ है या फिर उनके बारे में किसी से सुनना हुआ है, वे सब किसी आईपीएस की तरह बात करते हैं वहीं दूसरी तरफ जब किसी असाइनमेंट पर मुंबई से बाहर किसी देहाती या औसत शहरी जगहों पर गया हूं तो वहां बड़े अधिकारी भी वह छवि नहीं जमा पाते हैं. यही क्लास है!

क्लास माहौल से बनता है और माहौल की ही कीमत होती है. जो लोग माहौल नहीं भांप पाते वह पिछड़ जाते हैं और गुमनामी से हमेशा के लिए खो जाते हैं.

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अब जबकि तुम्हारे आने की आहट तुम्हारी मां ने भांप लिया है, मुझे तुम्हारे क्लास की फिक्र और ज्यादा हो रही है.

तुम्हें एक क्लास देना आसान तो नहीं होगा लेकिन उसके लिए किया जा सकने वाला हर काम तुम्हारा यह गरीब पिता जरूर करेगा. क्लास बड़ी चीज होती है लाडले.






Wednesday, May 10, 2017

समय से संवाद



                                                खाई

ह जो अंतहीन रिक्तियां है उसे भरने की जरूरत समय की मांग है. अलग-अलग दिशाओं की तरफ जाते हुए रास्ते के बीच दिख रही ये रिक्तियां अनिर्धारित आकार की हैं.

सामने से आ रही एक मोटरसाइकिल की जलती हुई हेडलाईट को देखकर पहले जहां हाथ उसे इशारा देने के लिए उठता था, वहीं आज हाथ की ऊंगलियां अपनी हेडलाईट के बटन पर जाती है कि कहीं अपनी हैडलाईट भी तो नहीं जल रही! सजगता, सतर्कता और सहजता का एक नया अध्याय है, जो नए समय में महसूस किया जा रहा है. यह एक रिक्ति है जो पहले और बाद के बीच में है.

पच्चीस के बाद का समय विचित्र होता है. तत्परता उस ओर से इस ओर शिफ्ट हो जाती है. ऐसा लगता है कि दूसरे को उसकी भूल का ध्यान दिलवाने में दिया जाने वाला वक्त आत्मसमीक्षा को दिया जाता है.

यू ट्यूब का शुक्रिया उन गानों को एक क्लिक पर उपलब्ध करवा देने के लिए जिसकी जरूरत अविलंब होती है. 

पिछले दिनों एंटोप हिल के पास षणमुखानंद हॉल में मशहूर गायिका सुमन कल्याणपुर के अस्सीवें जन्मदिन के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने म्यूजिक थेरेपी का जिक्र किया था. जब महाजन अपना संबोधन कर रही थीं तक शायद उन्हें यह अंदाजा नहीं होगा कि वह जिस थेरेपी की बात कर रही हैं उसका इस्तेमाल सभा में बैठा एक पत्रकार सालों से कर रहा है.

मेरी हर मनमानी सिर्फ तुम तक...
तू किसी रेल सी गुजरती है...
या रब्बा दे दे कोई जान भी अगर...
वगैरह वगैरह...












Wednesday, March 8, 2017

फुरसत


                                         समय से संवाद


ऐसे कितने ही ड्राफ्ट्स ब्लॉग में पड़ चुके हैं जो कभी पूरा होकर पोस्ट नहीं हो सके.

जो फिल्म अच्छी नहीं लगती हो उसके भी कुछ दृश्य स्मरण में रह जाते हैं. डियर जिंदगी के एक दृश्य में आलिया भट्ट मोबाइल पर एक मैसेज टाइप करती है लेकिन उसे भेजे बिना डिलिट कर देती है. ऐसा करते हुए मन में जो द्वद्व चलता है उसका लंबा अनुभव होने के कारण फिल्म का यह दृश्य करीब से छूकर गुजरता हुआ महसूस हुआ.

आप क्या लिख लेंगे!

कई लोग लिखते हैं. कई को पढ़ता हूं. पहले बहुत पढ़ता था आजकल समय की कमी के कारण सबको पढ़ना हो नहीं पाता. फिर भी कभी-कभी खोजता हूं तो पाता हूं कि कई लोगों ने लिखना छोड़ दिया है. इन लोगों के सामने भी शायद वही वजह होगी.

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सर्वेश से एक अंतराल के बाद बात होती रहती है. मुहल्ले का हालचाल पता चलता रहता है. तीन ताजी जानकारी मिली-















चंदन भैया की मां अब इस दुनिया में नहीं रही. रंजीत की मां का भी निधन हो गया और दो दिनों पहले गणेश सहनी भी दुनिया को अलविदा कह गये. इस तीन खबरों ने जितना झटका दिया उससे ज्यादा उस खबर ने दिया कि


Monday, February 20, 2017

खाली समय


                                           लिखने के लिए लिखना

जब पढ़ना बंद हो तो लिखना भी बंद कर देना चाहिए। बिना पढ़े लिखना अपनेआप में अविश्वास पैदा करता है क्योंकि लिखने वाले के मस्तिष्क में यह बात रहती है कि वह जो लिख रहा है उसका न तो कोई ठोस संदर्भ है और न ही सटीक विश्लेषण।

पढ़ाई किसी आदमी को उस मुहाने तक छोड़ देती है जहां से वह अनुभव के सहारे आगे का सफर तय करता है. जैसे कि कोई आदमी पढ़ाई पूरी करके नौकरी करता है और फिर कभी पढ़ाई की तरफ देखे बिना अपने अनुभव से सीखते हुए एक दिन अंत की ओर बढ़ता है. हालांकि कई नौकरियां ऐसी भी होती है जहां नियमित अध्ययन और नवीनता की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। पत्रकारिता ऐसी ही एक नौकरी है।

आम मान्यता है कि पत्रकारिता संवेदना से जुड़ा हुआ पेशा है. हालांकि व्यापक रूप से इसपर बहस जारी है कि संवेदना से जुड़ी पत्रकारिता करने वाले व्यक्ति को वास्तव में पत्रकार कहा जाए या नहीं! ऐसा इसलिए क्योंकि साहित्यकार और पत्रकार दो अलग-अलग शब्द हैं। अगर कोई पत्रकार संवेदना को साथ लेकर पत्रकारिता कर रहा है तो यकीनन या तो वह फीचर लिखता है या फिर मुख्यधारा की पत्रकारिता करते हुए वह ब्लॉगबाजी भी करता है।

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संवेदना से मेरी आखिरी मुलाकात कब हुई थी यह एकदम सही-सही याद करके बताना मुश्किल है. शायद तब जब उस अंग्रेजी शिक्षक ने मेरे सामने उस छात्रा का शुल्क कम कर दिया था, जो वहां अंग्रेजी पढ़ने आई थी. उस लड़की ने अध्यापक से सीधा कहा था कि वह अगले महीने से नहीं आएगी और वजह पूछने पर उसने दो टूक में कह दिया कि उसके पास अब देने के लिए रुपये नहीं हैं. हालांकि प्रथम दृष्टया मुझे वह मामला संवेदना से जुड़ा दिखा लेकिन फिर बाद में ऐसा लगा कि उस छात्रा के उस स्पष्टता से असहज हो जाने और तत्काल कोई विकल्प न सूझने के कारण उस शिक्षक ने यह "महानता" दिखाई. शक आदमी को ऐसा बना देता है कि वह गहरे में जाने का आदी हो जाता है और फिर एक दिन पत्रकार बन जाता है।

Monday, August 29, 2016



                                                काऊंटर बंद!

ब्लॉग खोलकर बैठे दस मिनट हो गये लेकिन तय नहीं हो पाया कि किसपर कहां से लिखना शुरू करना है!

इतने देर में दो कॉल आये. मन किया इन दोनों कॉल पर ही बारी बारी से सबकुछ लिखके दिमाग खाली कर दूं। तीन फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट फेसबुक पर आये जिनमें से एक को स्वीकार कर लिया और दो को वैसे ही रहने दिया. जिसे स्वीकार किया वह बेगूसराय का कोई नौजवान है। हमारे फ्रैंडलिस्ट में दो म्युचूअल फ्रैंड हैं, जिनमें से एक अंग्रेजी के वह शिक्षक हैं जहां मैं स्नातक के दौरान पढ़ता था और दूसरा मुहल्ले का ही एक लड़का है, जो मुहल्ले के चौक पर ही दुकान चलाता है।

सोचता हूं जे जे हॉस्पिटल के बारे में लिखूं। फिर लगता है लिखने से क्या होगा! क्या जो तीन आदमी ब्लड देने के लिए ओपीडी के काऊंटर के बाहर कतार में पंद्रह मिनट से इस इंतजार में थे कि काऊंटर वाले सज्जन आएंगे और प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, लिखने से उस प्रक्रिया में कोई तेजी आएगी! खुद पर भी क्षुब्ध हो गया था कुछ देर के लिए। साथ खड़ी सिस्टर को जब कहा कि लहाने सर ही डीन हैं न अभी तो उसके चेहरे का भाव थोड़ा बदला था। शायद उसे लगा होगा कि मैं डीन को फोन न लगा दूं!

डॉ समकित को पहली बार इस तरह बर्ताव करते हुए देखा। कोई बुजुर्ग अपनी पत्नी को व्हील चेयर पर ले जा रहा था। शायद कोई बात हो गई थी जिससे समकित नाराज थे। शुक्रवार को जब उनसे मिला था तो उनका फोन लगातार बज रहा था। जब वह खुश होकर बता रहे थे कि एम डी की पढाई भी पूरी हो गई तभी उनका फोन फिर से बजा तो मुझसे रहा नहीं गया और मैंने विनम्रता से कह दिया कि आप बात कर लीजिए। इस बीच जो चीज मैंने नोटिस की, वह उनके हाथ में समा चुका फोन था, जिसमें कैमरा तक नहीं था. काफी पुराना मॉडल का कोई फोन था.

एम डी करने और जे जे अस्पताल में डॉक्टरी करने के बाद ऐसा फोन! खैर!

डॉ समकित को मोह है गरीब मरीजों को देखने का. कुंआरे हैं. आगे क्या होगा पता नहीं! काफी देर बाद ब्लड लैब के काऊंटर पर एक आदमी आया लेकिन इंतजार कर रहे परिजनों के साथ कोई अनबन होने के कारण उसने यह कह दिया कि खून के नमूने लेने का समय खत्म हो गया है! मराठी में गर्मागर्मी हुई लेकिन बात दोनों के इगो पर आ चुकी थी तो नतीजा सिफर ही रहा. काऊंटर बंद!

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